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अनुच्छेद 370 का अंत…..तुरंत

                       

कल जो भी कुछ हुआ उसके बारे में तो आप सभी भली-भांति अब तक परिचित हो गये होंगे।वास्तव में अगस्त महीने का भारत के इतिहास में विशेष महत्व रहा है।चाहे वह 8 अगस्त को आरम्भ हुए ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की बात हो या 15 अगस्त को मिली आज़ादी की।कल यानि 5 अगस्त को एक और क्रांति का आगाज़ हुआ,जब जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा देने वाले अनुच्छेद 370 को लगभग 70 साल बाद निरस्त करने का रास्ता साफ़ हो गया।राज्यसभा ने इस अनुच्छेद 370 को समाप्तप्राय करने वाले प्रस्ताव पर ध्वनिमत से मुहर लगा दी है अब संभवतः आज लोकसभा से मंजूरी मिलते ही विशेष दर्ज़ा और अनुच्छेद 370 दोनों बेअसर हो जाएँगे।इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर की नागरिकता निर्धारित करने वाला अनुच्छेद 35A भी अर्थहीन हो जाएगा।विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद सरकार ने राज्य को दो भागों-जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दोनों को केन्द्रशासित प्रदेश बनाने का पुनर्गठन विधेयक भी पारित करा लिया।लद्दाख बिना विधानसभा के होगा जबकि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी।

यह तो संक्षेप में वह था जो कल हुआ और इस तरह से हुआ कि अपने आप पर विश्वास करना भी कठिन हो रहा था क्योंकि इतने सालों तक पिछली सरकारें हमें यह ही डराती रहीं कि अनुच्छेद 370 को ख़त्म करना एक बहुत ही असंभव कार्य है इसलिए हमने अनुच्छेद 370 का अंत तो नहीं ही इतनी जल्दी सोचा था हाँ 35A लगता था कि ख़त्म किया जाएगा क्योंकि इधर हफ्ते-भर से जम्मू-कश्मीर में अर्धसैनिक बालों की तैनाती और बहुत सी सुगबुगाहटें चल रहीं थीं।लेकिन जैसे ही अपने-अपने टेलीविजन पर लोगों ने गृहमंत्री अमित शाहजी को संसद में यह बोलते सुना तो अपने पर ही विश्वास नहीं हो रहा था ज़्यादातर लोग अपने अगल-बगल वालों से पक्का कर रहे थे कि कहीं वे गलत तो नहीं सुन या समझ रहे।इसीलिए कल जैसे ही मैंने यह सारा घटनाक्रम देखा,टीवी पर देखा एक विज्ञापन याद आ गया जिसमें मॉडल अपनी किसी बीमारी?के लिए बस एक गोली खाता है और गोली खाते ही बीमारी का अंत हो जाता है और बीमारी शायद कब्ज होती है और वह पुरुष मॉडल बोलता है “कब्ज का अंत….तुरंत”। इसी तरह कल हमारे भी मुंह से अनायास ही यह निकल गया “अरे 370 का अंत…..तुरंत”।

परन्तु हमारे देश का यह दुर्भाग्य रहा है कि यहाँ स्वस्थ आलोचना न होकर हमेशा एक-दूसरे की कमियां निकालने की जुगत भिड़ाई जाती है।कोई भी क्षेत्र हो वह इससे अछूता नहीं बचा।और तो और आम जनता भी इतना ज़्यादा इन दलों में बंट जाती है कि उसे भी अपने आस-पास के लोगों का दुःख दर्द तो दिखता नहीं उल्टा राजनीति करने का मसाला मिल जाता है जबकि हम जैसे आम लोगों को इन बातों से कुछ भी हासिल नहीं होता है उल्टा समाज में वैमनस्यता और फ़ैल जाती है।मुझे लगता है कि आम जनता को अब तो कुछ अपने विवेक से चलने का समय आ गया है।हालाँकि विगत कुछ वर्षों में इस तरफ लोगों ने ध्यान दिया है लेकिन अभी भी ‘कुछ’ तथाकथित बुद्धिजीवी लोग हिंदी,हिन्दू,हिंदुस्तान की बात आती है तो हिंदुस्तान का विरोध करने में स्वयं को ज़्यादा बुद्धिमान समझते हैं।अल्पसंख्यकों पर थोड़ा भी कुछ अत्याचार हो तो इनके विचार एकदम आग उगलने लगते हैं लेकिन वही बात उससे कहीं ज़्यादा हिन्दुओं पर हो तो इनका मौन देखने लायक होता है।ठीक है अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक किसी पर भी अमानुषिक व्यवहार सहने योग्य नहीं है लेकिन यह ‘असहनीयता’ सबके लिए बराबर होनी चाहिए।मुझे लगता है ऐसा करने वाला उन्हीं लोगों का समूह है जिसने कभी ज़मीनी हक़ीकत देखी ही नहीं।वह कहावत है न ‘जाकी कभी न फटी बिवाई वह क्या जाने पीर पराई’?ऐसे लोग आराम से अपनी जिंदगी गुजर कर रहे होते हैं उन्होंने कभी ऐसे अपने घर टूटने या छूटने का न दर्द सहा होता है न किसी अपने को उन्होंने ऐसे किसी घटनाक्रम में खोया होता है इसलिए वे ऐसी कोई घटना घटित होते ही अपनी महानता का ढिंढोरा पीटना शुरू कर देते हैं,जिसमें अल्पसंख्यकों का साथ देकर उनकी महानता कई गुना बढ़ जाती है।सही बात है किसी एक अल्पसंख्यक पर भी अत्याचार हो तो हर बुद्धिजीवी को उसका साथ देना चाहिए ही लेकिन यह बात एकतरफा क्यों रह जाती है?जम्मू-कश्मीर में जब वहां के अल्पसंख्यकों पर जो कि हिन्दू और सिक्ख हैं,अत्याचार हुए तो मैंने इस तरह का शोर किसी भी बुद्धिजीवी का नहीं सुना।

आश्चर्य तो मुझे तब और भी होता है जब टीवी के जो न्यूज़ चैनल हैं उनके लिए भी इस तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के अलग ही विचार होते हैं,जो चैनल सच्चाई दिखाता है और हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार या सैनिकों पर हो रही पत्थरबाजी को आम जनता तक पहुंचाता है वह तो ‘कट्टरपंथी’ या ‘सरकार का पिट्ठू’ चैनल हो जाता है और जो अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार को ही बढ़ा-चढ़ा कर दिखाता है और हिन्दुओं या उनके संगठनों की बुराई करता है वह बहुत ही निष्पक्ष और महान हो जाता है।यह सब कुछ राजनीतिक दल करें तो बात समझ आती है लेकिन आजकल आम जनता भी स्वयं को बुद्धिजीवी साबित करने के लिए ऐसा ही कर रही है।

कल राज्यसभा में निर्दलीय सांसद सुभाष चंद्रा जो कि भारत के सबसे विशाल टीवी चैनल समूह ज़ी मीडिया तथा एस्सेल समूह के अध्यक्ष हैं जिसने भारतीय उपग्रह टेलीविजन प्रसारण में क्रांति का सूत्रपात किया।उन्होंने ही 1992 में ज़ी टीवी की भारत में स्थापना की,जो हमारे देश का पहला केबल टीवी था।उन्ही का कल संसद में दिया भाषण सुनकर मुझे लगा कि हमलोगों को इन मीडिया चैनल के योगदान को भी नहीं भूलना चाहिए।कल सुभाष चंद्रा जी ने राज्यसभा में जो कहा वह सुनने लायक था।एक बात तो उन्होंने यह बताई कि जब 1994-95 में पाकिस्तान में बेनज़ीर भुट्टो की सरकार थी,तब चुनाव प्रचार के दौरान बेनज़ीर ने नवाज़ शरीफ़ और आजकल के प्रधानमंत्री इमरान खान के प्रचार का प्रसारण तब के पाकिस्तानी टीवी चैनल पर रुकवा दिया था और उस समय पाकिस्तानी टीवी चैनल के अलावा सिर्फ ज़ी टीवी ही पाकिस्तान में देखा जाता था जिसमे पाकिस्तान के और भी दलों का चुनाव प्रचार बराबर से  दिखाया गया।इसलिए जब बेनज़ीर के बाद दूसरी सरकार बनी तो और लोगों के साथ सुभाष चंद्रा जी को भी ‘स्टेट गेस्ट’ के रूप में पाकिस्तान बुलाया गया।वहां की जुडिशरी समिति की एक एसोसिएशन है,जिसने सुभाष जी को रात्रिभोज पर बुलाया और वहां पर उन लोगों ने ज़िक्र किया कि अगर आप की सरकार (भारत सरकार) धारा 370 ख़त्म कर दे तो कश्मीर का विषय ही हिंदुस्तान से ख़त्म हो जाएगा।वहां से भारत लौट कर सुभाष जी ने लगभग हर राजनीतिक दल के नेता से बात की और पूछा कि इस धारा को ख़त्म क्यों नहीं किया जाता?तो सबने यही कहा कि ‘यह धारा 370 हटानी तो चाहिए लेकिन यह एक राजनीतिक मुद्दा है जो हमें सूट नहीं करता इसलिए नहीं हटा रहे।’ वास्तव में हमारी सरकार बधाई की पात्र है जिसने इतना मजबूत निर्णय लिया।इसके अलावा एक और घटना का ज़िक्र कल राज्यसभा में सुभाष चंद्रा जी ने किया।उनका एक शो टीवी पर आता है ‘सुभाष चंद्रा शो’ जिसके सिलसिले में 2018 में वे कश्मीर के बारामूला जा रहे थे लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने उन्हें कहा कि आप न जाइए क्योंकि हम आपकी सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकते।फिर भी सुभाषजी बारामूला गये और 2000 युवाओं के साथ 4 घंटे बातचीत की।उन्होंने दिल्ली आकर बताया कि वहां का हर युवा,हर कश्मीरी भारत के साथ रहना चाहता है लेकिन अलगाववादी लोग ऐसा नहीं करने देते,लोग भी उनसे डरते हैं।उन युवाओं ने स्वयं सुभाषजी से कहा कि हम लोग टेरेरिस्ट नहीं हैं और आपलोग भी कश्मीरियों को टेररिस्ट मत दिखाइए।तब से सुभाषजी ने प्रण किया कि कश्मीरी लोगों को टेररिस्ट नहीं मानेंगे और न ही वे लोग अपने टीवी चैनल पर ऐसा कहते हैं हाँ कुछ अलगाववादी हैं जो इस काम के पीछे लगे हुए हैं।

क्या आपको नहीं लगता कि ऐसे मीडियाकर्मियों की भी अहम भूमिका होती है जो हमें आज के जैसे दिन देखने का सौभाग्य प्राप्त होता है।मेरा किसी भी चैनल या मीडियाकर्मी से कोई व्यक्तिगत लेना-देना या लगाव नहीं है लेकिन मुझे इस बात की कई बार चुभन होती है कि हममे से कुछ बुद्धिजीवी लोग स्वयं को बुद्धिमान साबित करने के लिए इस प्रकार के न्यूज़ चैनलों को कट्टर और इन बातों का उल्टा करने वालों को निष्पक्ष कहते हैं।निष्पक्ष तो अब हमें होने की ज़रूरत है।

इस अनुच्छेद के हटने से देश का और देशवासियों का भला ही नज़र आता है तो फिर कुछ लोग जो इसका विरोध करने पर तुले हुए हैं उन्हें अब तो थोड़ी शर्म कर लेनी चाहिए।बहन-बेटियों के हक़ में भी यह अनुच्छेद नहीं था क्योंकि जैसा कि एक दिन मैंने किसी कश्मीरी नेता को ही बोलते हुए सुना था कि ख़ुद फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने अंग्रेज़ क्रिस्चियन महिला से शादी की तो उस महिला को तो कश्मीर के सारे हक मिले।उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला ने भी गैरमुस्लिम-गैर कश्मीरी महिला से शादी की तो उसे भी सब हक मिले लेकिन फ़ारूक़ अब्दुल्ला की बेटी और उमर अब्दुल्ला की बहन ने जब सचिन पायलट से शादी की तो उसके सारे हक छिन गये।अब इस अनुच्छेद 370 के हट जाने से महिलाओं के हक भी वापस आ जाएँगे।

इस समय मेरे दिल में इतने सारी बातें हैं कहने को कि शायद इस विषय पर लिखती जाऊं तो कई घंटों तक अंत न हो लेकिन अब आज मैं अंत में सिर्फ एक और बात कहना चाहूंगी।इस अनुच्छेद 370 का विरोध करने वालों को क्या कभी उन लोगों का दर्द दिखा है जो इस के कारण अपनी जड़ों से 70 सालों से भी ज़्यादा कटे रहे।मैं बात कर रही हूँ भारत-पाक विभाजन के समय की।उस समय बहुत सारे लोग ऐसे थे जो उस तरफ से आकर जम्मू-कश्मीर ही बस जाना चाहते थे क्योंकि वहां उनके सारे रिश्तेदार और बिरादरी के लोग थे लेकिन उन लोगों को जम्मू-कश्मीर की नागरिकता नहीं मिली और इसलिए वहां से और कहीं बस जाने को उनलोगों को मजबूर होना पड़ा।यह कैसी इस अनुच्छेद की शर्त थी जिसके कारण अपने देश में ही किसी भी नागरिक को शरणार्थी का जीवन यापन करना पड़े।उस समय विभाजन के बाद आए लोग भारत के किसी भी हिस्से में जाकर बसे तो वे इस देश के नागरिक ही कहलाये लेकिन जो जम्मू-कश्मीर में बसा वह इस देश का ही हो न सका।आज भी वे शरणार्थी ही हैं और मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत से ऐसे परिवारों को जानती हूँ जो जम्मू-कश्मीर में 70 सालों से रहने के बाद आज भी शरणार्थी हैं उन्हें न तो विधानसभा के चुनावों में वोट देने का हक है न ही किसी सरकारी नौकरी को वे प्राप्त कर सकते हैं और न ही इस देश के नागरिकों को मिली हुई किसी भी सुविधा का वे लाभ ले सकते हैं।वाह री विडंबना ! उसी भारत-पाक विभाजन के समय 1947 में स्यालकोट से दिल्ली आकर बस गये इंद्र कुमार गुजराल तो भारत के प्रधानमंत्री बन जाते हैं और उसी समय उसी स्यालकोट से आकर जम्मू-कश्मीर बस जाने वाले लोग 70 सालों तक विधानसभा के चुनावों में वोट भी नहीं दे सकते और इस देश के नागरिक भी नहीं कहला सकते।ऐसे में उन लोगों की आज की ख़ुशी सोचकर देखिये जो शायद तीन पीढ़ियों के बाद अब अपने हक प्राप्त करेंगे।अब तो विरोध करने वालों को थोड़ा सोचने की ज़रूरत होनी ही चाहिए।

यह जो शरणार्थियों वाला दर्द है यह हमारे परिवार का भी भोगा हुआ है।मेरे दादाजी भी 1947 में भारत-पाक विभाजन के समय जब इस तरफ आए तो उनकी भी इच्छा जम्मू-कश्मीर बस जाने की थी क्योंकि हमारे सारे रिश्तेदार पहले से ही जम्मू-कश्मीर में थे।उत्तर प्रदेश तो शायद तब हमारे लिए विदेश ही था।यहाँ हमारा अपना कोई भी रिश्तेदार नहीं था।लेकिन तब लाख कोशिशों के बाद भी हमारे परिवार को जम्मू-कश्मीर की नागरिकता नहीं मिली और दो ही विकल्प मेरे दादाजी के आगे रहे होंगे कि या तो वहां रहकर आज तक शरणार्थी का जीवन बिताते या अपनी जड़ों से अलग होकर किसी और प्रान्त में बस जाते जैसे तब उन्हें उत्तर प्रदेश में बसना पड़ा।यहाँ बस कर हम बहुत खुश हैं लेकिन बस एक बात सोच कर देखिये कि जड़ों से कटना क्या होता है?कितनी तकलीफ होती है?मेरे पिताजी के मामा और उनके बेटे जम्मू के रंजीतसिंह पुरा में रहते थे और मेरी दादी अपने भाई बहनों को छोड़ना नहीं चाहती थीं लेकिन आप सोचकर देखिये कि आज से 70 साल पहले जब आवागमन और संचार के भी साधन उतने  नहीं थे ऐसे में एक झटके से पहले पाकिस्तान में अपने वर्षों से बसे बसाए घरों को छोड़ कर आना और फिर इस देश में भी जहाँ हमारी सारी जड़ें थीं उन्हें त्याग कर उनसे बहुत दूर बस जाना जहाँ से उस ज़माने में सालों तक किसी का हाल भी नहीं मिल पाता था।आज जब यह खुशखबरी आई तो मेरे पिताजी के मुंह से अचानक यही निकला कि “काश यह उस समय ही हो जाता तो मेरे माता-पिता को उनकी जड़ों से अलग न होना पड़ता।”यही हाल आज कश्मीरी पंडितों का होगा जो बेचारे अपने घर में ही बेघर हुए फिर रहे हैं।कुछ भी हो काम तो आज वह हुआ है कि बस……

चलिए देर आए दुरुस्त आए।जब एक ही देश के हम सब नागरिक हैं और कश्मीर तो हमारा मस्तक है तो फिर हमारा सब कुछ एक ही क्यों न हो फिर चाहे वह तिरंगा हो,संविधान हो या वहां का प्रधान हो।

 

 

4 thoughts on “अनुच्छेद 370 का अंत…..तुरंत

  1. परिवर्तन प्रकृति का नियम है और इस परिवर्तन के लिए सङ्कल्प शक्ति की आवश्यकता होती है।विस्थापित लोंगो का दर्द आम इन्सान नहीं समझ सकते।आज उनको न्याय मिला और हम सौभाग्यशाली हैं कि इस सकारात्मक परिवर्तन के साक्षी बने हैं। भारत माता का मुकुट अपनी चमक बिखेर रहा है और हमारा स्वर्ग पुनः अपने पुराने रूप में वापस दिखेगा।ऐसी सरकार के लिए भूरि भूरि प्रशंसा करनी चाहिए।पूरा राष्ट्र एक साथ है।अति सामयिक लेख।जड़ें खोने का दर्द महसूस करती हूँ।

  2. लेख पढ़ा । अति सुंदर। आज भारत मां के सारे लाल उसकी गोद मे आ गए । ये विरोधी क्या जाने ? विछोह क्या होता है । मात्रभूमि का आंचल अब सब के लिए एक है। जयहिंद

    1. बिल्कुल ठीक लिखा आपने।विछोह का दर्द सब नहीं समझ सकते।इसे समझने के लिए संवेदनशील होना बहुत ज़रूरी है।धन्यवाद आपने लेख पसंद किया।

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