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कविताएं बोलतीं हैं

अजय “आवारा”
चुभन पॉडकास्ट
“चुभन” पॉडकास्ट
                  – अजय “आवारा”

कोई तो लिखता है,
कोई दिल से लिखता है,
कोई सोच कर लिखता है,
पर कोई, पागलपन में लिखता है।

कोई सोच समझ कर लिखता है
कोई सुनाने के लिए लिखता है
कोई अपनी बात लिखता है
पर कोई दिल की बात लिखता है।

कोई साहित्य की बात लिखता है,
कोई नियमों के आधार पर लिखता है,
कोई ज्ञान के अर्थ लिखता है,
पर कोई अंतर की आवाज लगता है।

कोई गुरु तो कोई रहबर है,
कोई संयोजक तो कोई आलोचक है,
कोई आदर्श तो कोई समीक्षक है,
पर कोई, अपनी दीवानगी लिखता है।

कोई अर्थ है आदर्श का,
कोई आधार है संज्ञान का,
कोई रिश्ता है विश्वास का,
पर कोई, बस सच लिखता है।

कोई कहे तेरे दिल की बात,
कोई कहे मेरे मन की बात,
कोई सबका मन रखता है,
पर कोई , बस उद्गार लिखता है।

कोई उसे बेतुका कहता है,
कोई दर्द की पहचान कहता है,
कोई प्रेम के मनकों में देखे,
पर जमाना उसे आवारा कहता है।

नहीं बांध पाओगे उसे लफ्ज़ों में,
नहीं ढूंढ पाओगे उसे आंसुओं में,
खामोशी संग गुफ्तगू होती है जिसकी,
वो बस, तेरी तन्हाई में रहता है।

संवाद लोगों को जोड़ने का एक माध्यम है। फिर चाहे संवाद, भाषा के माध्यम से हो, लेखन के माध्यम से हो, या फिर वैचारिक संवाद ही हो। संवाद, सिर्फ मन को ही नहीं जोड़ता। बल्कि, विचारों की कड़ी भी संवाद के माध्यम से बढ़ती है। आज संवाद के माध्यमों की कोई थाह नहीं बची। असीमित माध्यम है, असीमित संपर्क सूत्र हैं। कोई सूचना पर आकर रुक जाता है, तो किसी की सीमा मनोरंजन तक होती है। पर क्या यह काफी है? जब तक संवाद के साथ मंथन ना हो, तब तक ज्ञान का माखन निकलकर नहीं आ सकता। तो क्या, संवाद को सिर्फ सूचना या मनोरंजन की परिधि में बांध देना, इसके पंखों को कतर देने जैसा नहीं है?

पर कौन देगा इसे पंख? कौन देगा इसे उड़ने का आसमान? कौन मथेगा इसे? और इसके राह तक पहुंचने का मार्ग दिखाएगा? इसके लिए हमें विभूतियों से जुड़ना होता है। इसके लिए समाज के धागों में बंधना पड़ता है। इसके लिए वैचारिक स्पर्धा के तानों- बानो में उलझना पड़ता है। इसके लिए हमें “चुभन” से जुड़ना पड़ता है।

“चुभन” को मात्र संवाद के साधन तक सीमित नहीं किया जा सकता। “चुभन”, सिर्फ एक व्यक्ति का विचार मात्र नहीं है। चुभन, सिर्फ लेखन का पुराण नहीं है। चुभन सिर्फ वाद-विवाद का शोर नहीं है। चुभन हमें जोड़ने के लिए सिर्फ एक कड़ी मात्र भी नहीं है। चुभन मन को उद्वेलित कर देने वाली उड़ान भी नहीं है। चुभन एक कुंजी है, जो इन सब के सूत्र को खोल देती है। “चुभन”के दरवाजे से हम उस राजमार्ग पर पदार्पण करते हैं, जो विचारों की छोटी-छोटी एक वैचारिक आंदोलन में समाहित हो जाती हैं।

हां, मैंने कहीं पढ़ा था। हां, मैंने कहीं सुना था। हां मैंने इसे सीखा भी था। पर “चुभन” पर, मैंने समझा था। साहित्य को, समाज को, परंपरा को, बदलाव को, हमारे अतीत को, कल के सपने को, धर्म की गूढता को, उलझे फलसफे को, और समझा है, खुद के अनछुए कोनों को।

एक शाम खुद के नाम,
एक शाम “चुभन” के नाम।

कविताएं –

1.
कोई मोहब्बत करे, कि उसके दर्द में सुकून मिलने लगे। कुछ ऐसा एहसास हो, कि जुदाई भी सुहानी लगने लगे। प्यार में सब हंस तो लेते हैं। प्यार हो तो ऐसा हो, कि उसके आंसू भी अपने लगने लगें। प्यार में जीने मरने की कसमें खाते आपने सुना तो होगा, पर क्या किसी को दर्द पाने की जिद करते सुना है? किसी को दर्द में जीने की ख्वाहिश करते सुना है? किसी को तन्हाई की इच्छा करते सुना है? ये भी एक रूप है प्यार का। ये भी एक रंग है प्यार का। ये भी एक एहसास है। साथ जिए तो क्या जिए, जीना तो वो जीना है, जब महबूब की दूरी में जिए। बहुत जिए होंगे तुम उसके सपनों को लेकर, कभी उसके आंसुओं के संग भी तो जी कर देख। बहुत देखा इश्क, रंग में और फूलों की बहारों में। कभी, उसकी बेरुखी से भी प्यार करके तो देख।
आइए देखते हैं, इश्क का ये रंग भी-

तेरे इश्क की एक निशानी दे दे,
मुझे अपने दर्द की कहानी दे दे।

हर् रात तो मेरी ऐसी नहीं होती,
मोहब्बत तेरी आज रूहानी दे दे।

यूं तो ये रीत नहीं रही इश्क की,
तेरी सिसकियां वो पुरानी दे दे।

नहीं देखेंगे मुड़कर तुझे कभी भी
तेरी उदासियां भी दीवानी दे दे।

छोड़ जाएगा आरजुएं आवारा,
भूल जाने का वादा जुबानी दे दे।

2.
मां, एक शब्द मात्र नहीं, एक रिश्ता मात्र नहीं, ये कड़ी है, हर रिश्तों की शुरुआत की। ये तो सूत्र है, हर एहसास का।एक और रिश्ता है, साथी का रिश्ता। जो अपने आप बनकर नहीं आया। जो किसी ने हमें नही समझाया। ये तो बस जुड़ गया क्योंकि वो कुछ अपना सा लगा। जाने ये रिश्तो की महत्वाकांक्षाएं है, या उनकी मजबूरी? कुछ रिश्ते बदल गए, कुछ खो गए, कुछ मुड़ गए किसी मोड़ पर। मां का आसरा भी इनमें ही कहीं दब कर रह गया। रिश्ते की परिभाषा और कर्तव्य निश्चित हो गए। और साथी, जिस रिश्ते का आभास हमें किसी ने भी नहीं समझाया। वो अब भी मेरा हाथ पकड़ कर चल रहा है। जब मैं अकेला हूं, तब भी वो कदम दर कदम मेरे साथ चल रहा है। उसके आंचल में रो लेता हूं और जब तन्हा होता हूं तो उसके साए में खुद को समेट लेता हूं। आइए कोशिश करते हैं इस रिश्ते की गहराई में उतरने की-

मां तो नहीं संग मेरे अब,,
आंचल की कोमलता में
तुम हो ना।
पता भी छोड़ गए मुझे,
छूटा वह साया तो क्या
तुम हो ना।
भाई बहन दोस्त भी मिले,
जाने कब
अपनी मंजिल की ओर चले,
साथ में छूटा सबका तो क्या
तुम हो ना।
कोई बंधन था तन का,
कोई आत्मा का,
तो कोई दिल का।
जाने कब, रास्ते बदल गए उनके
तन्हा रास्तों का कदम
तुम हो ना।
बेटा-बेटी भी उम्मीद थे,
पर वो भी तो कहीं मशरूफ थे।
जहां छूटा था
दामन उम्मीद का,
वहां से डोर उम्मीद की
तुम हो ना।
नहीं था सहूर मुझे जीने का,
कहां था इल्म मुझे,
खुद के होने का।
मेरा वजूद, जिंदा है अब भी
क्योंकि, तुम हो ना।

3.
बड़े अहं से हम सब कहते हैं कि हम बड़े हो गए हैं। शायद हम समझदार भी हो गए हैं। थोड़ा ज्ञान भी आ गया है शायद हमारे अंदर। पर ना जाने हम कितनी चीजों को पीछे छोड़ आए हैं। इतने भाव हमसे छूट गए। हम खुद को कहीं भूल आए हैं। कभी कोशिश की है अपने बचपन को ढूंढने की। क्या कभी कोशिश की है खुद को पहचानने की? या कभी मंथन किया है कि हमने क्या खोया? हमारे आज की कीमत हमने क्या चुकाई है? कहीं हम आडंबर तो नहीं ढो रहे? समय के साथ-साथ, मैं थोड़ा-थोड़ा खुद से अलग होता गया। होने के साथ-साथ मैं खुद को भूल गया। न जाने मेरी पहचान कहां दब कर रह गई? मैं कहां हूं खुद को पुकारता हूं तो मेरी अपनी आवाज मुझे सुनाई नहीं देती। आइए थोड़ा खुद को टटोला जाए, आज अपने बचपन से मिला जाए-

आज, बचपन के साथ
चहलकदमी करने का मन हुआ।
नुक्कड़ पर ही, भोलापन
मेरा इंतजार करता मिला।
वो, मुझे उस दरवाजे पर ले गया
जहां मेरी शिकायतें
अब तक इंतजार में बैठी थीं।
बरामदे की कुर्सी पर,
मेरा हठ यूं ही पसरा पड़ा था।
अंदर कमरे में,
मासूमियत मुंह फुलाए बैठी थी।
भीतर आंगन में,
शैतानियां हौले हौले मुस्कुरा रही थीं,
मुझे देखकर।
मानो, सब मुझसे लड़ना चाहती थीं।
लंबी फेहरिस्त थी,
इनके शिकवों की।
बार-बार पूछ रहे थे,
तुम, हमें यूं छोड़कर क्यों चले गए।
क्या, समझदार इंसान
इतना मतलबी हो जाता है?

4.
धर्म आस्था है या नियम? धर्म कर्तव्य है या भ्रम? धर्म विश्वास है या अंधविश्वास? धर्म एक मार्ग है या मंजिल? मुझे एक राजमार्ग मिला था खुद को पहचानने का, खुद से मिलने का और मेरे ईश से एक हो जाने का।जाने किसने उस रास्ते पर कंकड़ और कांटे बिखेर दिए। धर्म वो धारणा है, जिसकी व्याख्या सब ने अपने-अपने तरीके से की। सबने अपने-अपने तरीके से इसके मतलब समझाए। सबने अपने-अपने तरीके से इसका विस्तार किया, इसकी विवेचना की। हर एक ने धर्म के तने में अपनी एक नई शाखा जोड़ दी। कितनी उलझ गई हैं वो शाखाएं। पता ही नहीं चलता शाखा कौन सी है और तना कौन सा? जड़ कहां है और शीर्ष कहां है? और उनके तनों-शाखों में, मैं इस तरह उलझ गया हूं कि मुझे बाहर निकलने का कोई सूत्र भी दिखाई नहीं देता। क्या कोई मुझे उस मुख्य सोच तक पहुंचा पाएगा? किसी ने अपने अनुसार समझाया तो किसी ने इसे अपने अनुसार समझा। कभी कोई मुझे पुकारता है तो कभी दूसरा आवाज देता है। समझ नहीं आता जिस आधार की सुरक्षा के लिए हम लड़ मर रहे हैं हमारा वो आधार है कहां? ऐसा प्रतीत होता है कि शाखाओं ने धर्म की जड़ों को इस तरह जकड़ दिया है कि वह भी शायद दम तोड़ चुकी हैं। हम शायद ये भूल चुके हैं कि धर्म का रूप क्या रहा होगा? हर कोई इसे अपने आप से परिभाषित करने में पीछे नहीं रहता। किसकी सुनें, किसकी मानें, किसको समझें? चलिए एक कोशिश करते हैं इसके सिरे को फिर से पकड़ने की-

आधा परखा और आधा समझा,
धर्म का ऐसा आधा अधूरा बखान,
कोई बता दे मुझे ऐसा क्यों होता है,
धर्म का क्यों आज व्यापार होता है।

यह कैसा विश्लेषण यह कैसा अर्पण,
भूला मानस प्रीत और अपना पन,
इंसानियत को यह दर्द क्यों होता है,
धर्म का क्यों आज व्यापार होता है।

कैसी यह समझ, कैसा यह बखान,
भूले इंसान को, अब कैसा यह बयान,
जानें क्यों यह दिलों को बांट देता है,
धर्म का क्यों आज व्यापार होता है।

भूले लक्ष्य गीता का, क्यों अधूरे पुराण,
राह से भटक गई, क्यों अब यह कुरान,
बाइबल रोए, अरदास में दर्द होता है,
धर्म का क्यों आज व्यापार होता है।

क्या‌ कोई इंसानियत सीख पाएगा,
भटके मानव को कोई रोक पाएगा,
क्यों फरिश्तों को अब दर्द होता है,
धर्म का क्यों आज व्यापार होता है।

5.
तू दुलार है, मेरा सपना है, मेरा प्रतिबिंब है। तुझे देखता हूं तो खुद से मिलता हूं। इसीलिए तेरी मुस्कुराहट की कद्र करता हूं। शायद तभी तो तेरे आंसुओं को चुन लेता हूं। और सहेज लेता हूं अपनी यादों में। इन मनकों में तेरी खनक है। इनमें मासूमियत है, इनमें वो यादें हैं, इनमें मेरा बचपन है। तू है तो मैं फिर से खुद को जीता हूं। इसीलिए मैं इन्हें सहेज कर रखता हूं। सबसे दूर पर दिल के करीब रखता हूं। तेरे आंसुओं में, मैं खुद को जीता हूं। तुझ में मैं खुद को पाता हूं।
क्या इस मासूमियत की कोई सीमा है? जाने कैसे मेरी वो तस्वीर उभर आती है, जो मैं भूल चुका था। तेरे आंसुओं के साथ-साथ मेरी वो यादें चली आती हैं, जिन्हें मैं भूल चुका था।
इन आंसुओं के संग संग मैं खुद को, जीने लगा हूं-

आंसू तेरे मैंने, अपनी जेब में रखे हैं,
कुछ पल हंसी के, तेरे पास रखे हैं।
दर्द जो तेरे हिस्से का था,
वो किसी और देश में रखे हैं।
जिन फूलों से बात करती थी तू,
उनमें सपन सलोने रखें हैं।
रात भी जागती होगी यह रैन भी,
तो कुछ चिराग जला कर रखे हैं।
दर्द को क्यों शिकन हो तुझसे,
मैंने दूर उनके दायरे रखे हैं।
कुछ लम्हे आए थे शिकायत ले कर,
वो सब सरहद के पार रखे हैं।
चला था चांद तेरे ख्वाब ले कर,
तेरे सिरहाने के वो पास रखे हैं।
सुकून मिले तेरे रहबर को भी,
इसलिए गम,तड़ी पार कर रखे हैं।
आंसू तेरे मैंने, अपनी जेब में रखे हैं।

6.
अजब रीत है दुनिया की, अजब मानदंड है दुनिया का, अजब प्रचलन है दुनिया का। तेरे लिए कुछ, मेरे लिए कुछ। सबको लगता है कि वो सही है और सबको लगता है कि मैं गलत हूं। या ये एक कशमकश है, जिसमें तुम भी उलझे हो और मैं भी उलझा हूं। जो रास्ता मुझे मंजिल की ओर ले चला था जाने वह खुद कहां खो गया? जिस पट्टीका ने मुझे रास्ता दिखाया था, उसे खुद अपने मार्ग का ज्ञान नहीं रहा। ना वो गलत, ना तू सही, ना मैं सही। तू रख अपना ईमान ऐब में छुपा कर। मेरी उदासी तुझे ढकोसला ही नजर आती है। पता नहीं दुनिया एक है, या दूसरी एक और दुनिया हमने अपने चारों ओर बुन ली है। अब तो ये भी समझ नहीं आता, मेरी दुनिया कौन सी है और तेरी दुनिया कौन सी है? असल कौन सी है और नकल कौन सी है? पता नहीं तेरे पाप और मेरे पुण्य की परिभाषा अलग अलग क्यों है?देखें तू क्या कहता है और मैं क्या कहता हूं-

फरेब करती रही दुनिया तेरे दर पर,
मैंने जरा सी पी ली तो शोर क्यों है।

दगा बाजों की बस्ती है जिस शहर में,
ईमानदारी से उन्हें लगता डर क्यों है।

लोग कहते हैं हर कण में बसता है तू,
तो खास दर पर ही झुकता सर क्यों है।

सुना है यह भी रवायत है नामदारों में,
तेरे नाम की खाता वो कसमें क्यों है।

खुद को तो तेरा शागिर्द कहता है वो,
उसके सजदे में झुकती दुनिया क्यों है।

7.
पुण्य के पीछे भागते भागते, अपनी रीत निभाते निभाते, अपने कर्तव्यों की परिभाषा बनाते बनाते, समाज को आकार देते देते, न जाने हम कहां चले आए हैं? जहां पर पाप भी कर्तव्य लगता है। जहां पाप दुनिया की रीत रखता है। क्या समाज का यही बदलाव है ? क्या यही बदलाव है परंपराओं का? क्या इसलिए ही हमने रिवाज बनाए थे। या फिर समाज के मापदंड यूं ही बनाए गए थे कि वो सब एक दिन भरभरा कर गिर जाएंगे। जाने कब आया ये तूफान?बिना किसी आवाज बड़ी खामोशी से। हर मानदंड को धराशाई करता चला गया। इंसान ज्यादा समझदार हो गया है, पुण्य और पाप की परिभाषा अपने हिसाब से देने लगा है। आइए देखते हैं हम कितना बदल गए हैं। आइए देखते हैं हमारे रिवाज कितना बदल गए हैं। आइए देखते हैं हमारी रीतियों की रूपरेखा आज क्या है? है ना अचरज की बात इतनी चतुराई से हमने हर मानदंड को बदला है। आइए देखते हैं आज के बदले हुए मानदंड क्या हैं?

तू कहता है मैं पाप करता हूं,
मैं तो बस दुनिया की रीत निभाता हूं।
थोड़ा फरेब रखता हूं साथ अपने मै,
और थोड़ा वहम भी रखता हूं।
चालबाज हूं मैं थोड़ा सा,
धोखा अपने साथ रखता हूं।
दिल के भाव मैं क्या जानूं,
उन्हें तोड़ने का इल्म रखता हूं।
प्यार का सिला, बस की बात नहीं मेरे,
दर्द का मैं व्यापार करता हूं।
भरोसा तोड़ना मेरी आदत सही,
झूठ के मैं साथ चलता हूं।
इंसानियत की बात करे जो कोई,
न उन पर मैं कान धरता हूं।
कुचलता हूं अधिकारों को मैं,
द्वेष मैं अपने साथ रखता हूं।
बोल चाहे जो बोलूं जुबां से,
दिल में बात कुछ और रखता हूं।
सेवा का युग रहा होगा कभी,
स्वार्थ की कुंजी अब साथ रखता हूं।
सीधा खयाल समझ नहीं आता,
जालसाजी का गुर भी रखता हूं।
तू कहता है मैं पाप करता हूं,
मैं तो बस दुनिया की रीत निभाता हूं।

8.
कदम चल पड़े कमाने के लिए, कदम चल पड़े खुद को ढूंढने के लिए, कदम चल पड़े अपनी पहचान बनाने के लिए। चलते चलते जाने हम कितनी दूर निकल आए? इतनी दूर, कि शायद हम अपने पुराने पते पर कभी लौट भी ना पाएं। हम ये जान भी ना पाएं कि कौन हमारी प्रतीक्षा में बेसुध है? किसे हमारे कुशल क्षेम की बेताबी है। अपने दिल में है लेकिन इतना आगे निकल आए हैं कि वो आवाज हमें सुनाई ही नहीं देती है। हमें उनकी सिसकियां चीरती हैं। हम लौट आने का वो वादा भूल चुके हैं, जो हमने किसी से कभी किया था। हम वो निशान भी भूल चुके हैं जिनके मार्गदर्शन पर हमने ये राह पकड़ी। आज वो राह भी अनजान है, वो निशान भी अनजान है, वो वादा भी अनजान है, और वो रिश्ता भी अनजान है। अनजान है वो आवाज कि जो हमें पुकारती है, चीख-चीख कर बुलाती है। पर शायद वो चीख हमारे कानों तक नहीं पहुंचती हमारे ज़ेहन को नहीं छूती। मां के रोने की आवाज नहीं सुनती और बाप की पुकार नहीं सुनती-

मां कुछ कहती नहीं है,
तो क्या, वो रोती भी नहीं है?

तू छोड़ चला उसे परदेस,
ना कोई चिट्ठी,
और ना कोई संदेश।
बैठी वो सोचे आठों पहर,
क्यों छोड़ा तूने यह देश।

मां ….

जब तू लौट कर न आया था,
मुझे उसने कितना बुलाया था।
अकेली हूं मैं, यह भी समझाया था,
तेरे पिता भी राह तकते हैं,
यह भी तो तुझे बताया था।

मां……

दर्द अब वो किस से बांटें,
दिल करे तो वो किस को डांटे।
कुछ सोच कर, संदेशा भिजवाया होगा,
सोचे अकेली, क्या करूं मैं आगे,
तेरी याद किस खूंटी पर टांगे।

मां….

2 thoughts on “कविताएं बोलतीं हैं

  1. साल का अंतिम कार्यक्रम बहुत ही मनोरंजक और अच्छा लगा।अगले वर्ष भी ऐसे ही कार्यक्रमों की अपेक्षा रहेगी।

  2. कविताएँ बोलती हैं शब्दो और एहसासों के साथ रूबरू हो जाती हैं। बहुत खूब कार्यक्रम। बधाईयाँ अजय जी को और चुभन को
    नये साल की बधाईयाँ और शुभकामनाएं 🙏🙏

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