मेरी बात –
दोस्ती कोई लिखित अनुबंध नहीं होती, न ही उसमें शर्तों की लंबी सूची होती है, फिर भी दोस्ती की अपनी एक नैतिक भाषा होती है, जिसमें भरोसा, सम्मान और संवाद सबसे बड़े शब्द होते हैं और यह कहानी उन्हीं शब्दों के टूटने और जुड़ने की है अच्छा लगेगा यदि आप अपने बहुमूल्य सुझाव देकर मेरा मार्गदर्शन करेंगे……।
डॉ. आरव और नील दोनों की दोस्ती साहित्यिक मंच पर हुई थी। एक-दूसरे के स्वभाव से बिल्कुल अलग, फिर भी जैसे किसी अदृश्य धागे से बँधे हुए। यह कोई साधारण दोस्ती नहीं थी, जिसमें रोज़ मिलना ज़रूरी हो। यह वह दोस्ती थी, जिसमें महीनों बाद मिलने पर भी बात वहीं से शुरू हो जाती, जहाँ छूटी थी। उनकी मुलाक़ातें औपचारिक नहीं रहीं थीं। कभी किसी संगोष्ठी में, कभी पुस्तक विमोचन के बाद चाय पर मिलना बातें करना इसमें शामिल था। वे खुल कर बातें करते वहाँ कोई “ किसी भी बात का कोई समीकरण नहीं होता था साथ ही कोई छुपाव, कोई स्पष्टीकरण, कोई सीमा-रेखा नहीं थी…..था तो सिर्फ़ उम्र का अनुभव था और यह समझ कि जीवन अब प्रतिस्पर्धा नहीं, संवाद है। यह वह उम्र थी जहाँ किसी को ‘पाना’ नहीं था और न ही खोने का डर था, न साबित करने की बेचैनी। उनकी दोस्ती में कोई ‘विशेष’ नहीं था….न कोई देर रात की रहस्यमय मुलाक़ातें, न कोई छुपी हुई भावुकता कोई गोपनीयता या कोई प्रदर्शन बल्कि वे एक-दूसरे के घर जाते, परिवार के सामने, शिष्यों के बीच, सार्वजनिक मंचों पर…..क्योंकि उन्हें छिपाने के लिए कुछ था ही नहीं इसलिए वे कभी दूर नहीं हुए।
और हाँ दूर होने का सवाल भी नहीं था…क्योंकि दूरी वहाँ आती है, जहाँ स्वामित्व होता है। उनके बीच तो केवल साझापन था, और शायद यही सबसे परिपक्व, सबसे स्वच्छ, और सबसे ईमानदार साहित्यिक मित्रता होती है। और शायद यही 50 – 60 के दशक के नागरिकों की सबसे परिपक्व, सबसे सुंदर, और सबसे ईमानदार दोस्ती होती है…..जहाँ उम्र केवल संख्या होती है, और, साहित्य जीवन का स्थायी संवाद।
डॉ. आरव इक कहानीकार, उपन्यासकार निबंधकार, वक्ता थे। उनकी वाणी में प्रवाह था, और स्मृति में पूरा साहित्यिक संसार। वे किसी के विरोधी नहीं थे, पर अक्सर किसी के पक्ष में बहुत जल्दी हो जाते थे। पिछले कुछ महीनों से नील एक असुविधा महसूस कर रहें थे। कोई घटना नहीं हुई थी…कोई शब्द नहीं कहा गया था…बस – कुछ न बताया जाना धीरे-धीरे दिखाई देने लगा था। डॉ. आरव इन दिनों एक नए नाम का अत्यधिक उल्लेख करने लगे थे…आलोक। “बहुत मौलिक लेखक है।” “अद्भुत दृष्टि।” “ भविष्य की उम्मीद।” नील सुनते रहते थे, पर कुछ कहते नहीं थे, क्योंकि साहित्य में प्रशंसा अपराध नहीं होती और मित्रता में प्रशंसा पर रोक, असंस्कृत मानी जाती है, पर बात सिर्फ़ प्रशंसा की नहीं थी।
एक दिन नील को पता चला…संयोग से, कि डॉ. आरव – आलोक को लगातार साहित्यिक मंचों पर ले जा रहे हैं, संगोष्ठियाँ, पाठ, परिचर्चाएँ….और यह सब बातों का सिलसिला जारी रहने के मध्य भी…बिना नील को बताए… पता नहीं क्यों वह यह बात नील को बताना नहीं चाहते थे। यह आलोक कोई नया व्यक्ति नहीं था….वह डॉ. आरव का पुराना परिचित था…पर वह वही था जो अपनी जरुरत पर तो उनके गले पड़ जाता पर उनकी ज़रूरत के समय अक्सर उपस्थित नहीं रहा। किसी पुस्तक का विमोचन था, वह शहर में नहीं था……जब किसी मंच पर ज़रूरत थी वह मौजूद नहीं था….पर अब वह हर मंच पर था…और डॉ आरव उसका गुणगान कर रहे थे। नील ने पहली बार इस विषय पर बात की….बहस नहीं की….सवाल भी नहीं किया।
वैसे भी “कर्तव्य तब संदिग्ध हो जाता है जब वह चुप्पी के साथ निभाया जाए।” नील ने कहा – “हमें किसी से जलन नहीं है, आरव…..पर हमें यह जानने का अधिकार है कि हमारे साथ हमारी दोस्ती में कौन प्रवेश कर रहा है।” आरव ने पहली बार अपनी बात को शब्दों में टटोला और कहा कि, …“मैं नहीं चाहता था कि आप इसे व्यक्तिगत समझें।” नील नें तुरन्त कहा “और तुमने यह नहीं सोचा कि न बताना ही इसे व्यक्तिगत बना देगा?” असल द्वंद्व यहाँ था…. साहित्यिक नैतिकता बनाम व्यक्तिगत निकटता।
आरव को लगा….वे सही कर रहे हैं….पर नील और अलोक जानते थे कि साहित्यिक मंच सिर्फ़ प्रतिभा से नहीं, निष्ठा से भी बनते हैं। नील नें कहा – “हमें आलोक से कोई आपत्ति नहीं है…आप उसे मंच पर लाएँ….पर हमसे छुपाकर क्यों?” आरव ने स्वीकार किया…..“क्योंकि मुझे डर था कि आप लोग उसके अतीत को देखेंगे वर्तमान को नहीं।” कुछ देर की चुप्पी….यह चुप्पी नाराज़गी की नहीं थी। यह उस उम्र की चुप्पी थी जहाँ शब्द बोलने से पहले अपनी आत्मा से सलाह ली जाती है। “हम इस उम्र में किसी को खोने से नहीं डरते…..पर हम यह ज़रूर चाहते हैं कि जो साथ है वह साफ़ हो।” नील की आँखें नम हो गईं उसने शांत स्वर में कहा – डॉ. आरव! “साहित्य कभी भी किसी की अनुपस्थिति की भरपाई नहीं करता, वह सिर्फ़ सच्चाई को और उजागर करता है।” और वह वहाँ से चला गया।
उस दिन कोई निर्णय नहीं हुआ…कोई दूरी नहीं बनी…कोई संबंध नहीं टूटा, पर एक बात स्पष्ट हो गई कि, घनिष्ठता अगर संवाद के बिना बढ़े, तो वह साहित्यिक भी हो तो नैतिक नहीं रहती।
डॉ. आरव नें यह नहीं सोचा कि नील बदल गया है….पर वह उनसे बात नहीं करता यह एहसास उन्हें धीरे-धीरे आया। जैसे किसी पुराने घर में हवा तो वही रहती है, पर खिड़की बंद हो जाए। डॉ. आरव, जो जीवन भर शब्दों से काम लेते आए थे, पहली बार शब्दों की अनुपस्थिति से असहज होने लगे। उनका मन अपने ही तर्कों से उन्हें समझाने लगा……“मैंने कुछ गलत नहीं किया…..साहित्य में अवसर देना अपराध नहीं….नील परिपक्व तो है ही कि इसे समझे।”
यही तर्क उन्हें राहत देता था…..पर उसी के नीचे एक दूसरा स्वर भी था कमज़ोर, पर लगातार….कि, “अगर सब ठीक है, तो वह अब वैसा क्यों नहीं रहा ?” यह प्रश्न उनके भीतर धीरे-धीरे अपराधबोध नहीं, अस्वीकार की आशंका बन गया। इसी बीच, नील को पता चला कि डॉ. आरव, अलोक से जब भी मिलते उससे छुपाते हैं। पहले एक-दो बार, फिर नियमित। बातें भी होने लगीं लंबी, सहज, जैसे कुछ हुआ ही न हो। नील को इससे कोई आपत्ति नहीं थी….. उसे किसी से मिलने या बात करने पर कभी ऐतराज़ रहा ही नहीं। दोस्त स्वतंत्र होते हैं यह वह मानता था….पर जो बात उसे भीतर से कचोट रही थी, वह थी अनदेखी क्योंकि डॉ आरव ने न कभी बताया, न कभी इसका ज़िक्र किया….हाँ वह करते ठीक वैसे, जैसे नील की मौजूदगी इस हिस्से में अनावश्यक हो….तब पहली बार नील ने खुद को अलग महसूस किया।
उसने सीधे सवाल नहीं किया क्योंकि दोस्ती में वह हिसाब-किताब से डरता था पर मन में एक सवाल बार-बार उठता- “जिस इंसान ने मेरे दोस्त को बार-बार अपमानित किया, दूसरे से उसकी बुराई कि और उसके लिए उसे जिम्मेदार ठहराया कि नील ही उन्हें अलोक के पास जबरदस्ती लेकर गया था उसी से इतनी गहरी दोस्ती…मुझसे न बताना पूछने पर अनमना सा जबाब?” नील ने यह सब महसूस किया, पर उसने शिकायत नहीं की….वह इंतज़ार करता रहा कि शायद आरव खुद बोले।
एक दिन नील को यह स्पष्ट हो गया…..“जो रिश्ता अपनी पारदर्शिता खो देता है, वह अब मेरी ज़िम्मेदारी नहीं।” और यह निर्णय कठोर नहीं था…यह थकान से उपजा था। वह जानता था कि, अगर वह पूछेगा तो डॉ. आरव सफ़ाई देंगे, अगर सफ़ाई देंगे, तो बात तर्क में बदल जाएगी…और तर्क दोस्ती को अदालत बना देता है…..नील इस उम्र में अदालतों से दूर रहना चाहता था।
डॉ आरव कई बार फोन मिलाते.. फोन नहीं उठता….फिर काट देते…..उन्हें डर था कि, अगर उन्होंने पूछा, “तुम चुप क्यों हो?” तो उत्तर सुनने का साहस शायद उनमें नहीं होगा। क्योंकि कुछ उत्तर हमारी स्व-छवि को सीधे चुनौती देते हैं। और डॉ. आरव की स्व-छवि थी….न्यायप्रिय, उदार, साहित्य के प्रति निष्ठावान। यह मान लेना कि उनसे किसी मित्र को चोट पहुँची है…उनके लिए स्वयं को नया पढ़ने जैसा था। नील की चुप्पी उनके लिए दंड नहीं थी पर वह दर्पण बन गई थी। एक ऐसा दर्पण जो कहता नहीं था, बस दिखाता था….कि कहीं न कहीं उन्होंने मित्रता की जगह अपने निर्णयों को प्राथमिकता दी थी। कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं टूटते….वे टूटते हैं जब शब्दों का साझा एकतरफ़ा हो जाता है।
डॉ. आरव और नील की मित्रता वर्षों पुरानी थी। न कोई लेन-देन, न कोई दिखावा। वे एक-दूसरे की असहमति का भी सम्मान करते थे। नील कभी यह नहीं चाहता था कि डॉ. आरव सिर्फ़ उसे ही प्राथमिकता दें …..उसे बस इतना चाहिए था कि उसे अनदेखा न किया जाए। लेकिन अनदेखा किया जाना अक्सर चुपचाप होता है…….और सबसे अधिक चोट वहीं से लगती है। आज भी कोई सार्वजनिक कटुता नहीं है…पर उनके बीच अब जो है, वह दोस्ती नहीं….उसकी स्मृति है, और कभी-कभी यही स्मृति सबसे ईमानदार रिश्ता होता है….क्योंकि उसमें न शिकायत होती है, न सफ़ाई…..बल्कि बस यह स्वीकारता होती है, कि हम एक-दूसरे के जीवन में कुछ समय तक साथ थे, और वह समय झूठा नहीं था।
पहले-पहले तो डॉ आरव ने इस चुप्पी को सामान्य माना। उम्र, व्यस्तता, स्वास्थ्य….कारण खोज लेना आसान था। पर धीरे-धीरे उन्हें यह महसूस होने लगा कि कुछ अनुपस्थित है…..कोई आवाज़ नहीं, कोई असहमति नहीं, कोई तटस्थ टिप्पणी नहीं, और यही सबसे अधिक खलने लगा…क्योंकि जो व्यक्ति केवल सहमति देता है, वह श्रोता हो सकता है, पर जो असहमति भी सम्मान के साथ रखता है, वही मित्र होता है। नील का मौन उन्हें पहली बार अपने व्यवहार को भीतर से देखने को विवश करता है।
आत्मालोचन की प्रक्रिया में डॉ आरव ने स्वीकार किया….कम से कम स्वयं से…कि उन्होंने कभी जानबूझकर किसी का भी अपमान नहीं किया…पर यह भी उतना ही सत्य था कि उन्होंने कभी यह भी नहीं सोचा कि छुपाना भी एक प्रकार की उपेक्षा हो सकती है। उन्होंने नील को कभी बाधा नहीं माना, पर सुविधा के समय उन्हें संदर्भ बना लेना और संवाद के समय अनदेखा कर देना….यही वह सूक्ष्म चूक थी जो मित्रता को असंतुलित कर देती है। वैसे यह कोई नैतिक अपराध नहीं था पर नील के अनुसार नैतिक चूक अवश्य थी। बौद्धिक सत्ता और नैतिक संयम डॉ आरव को यह समझ में आने लगा था कि बौद्धिक संसार में सत्ता पद या प्रसिद्धि से नहीं, विश्वसनीयता से आती है। और विश्वसनीयता उन लोगों से बनती है जो हमारे साथ खड़े नहीं होते, बल्कि हमें सही समय पर आईना दिखाते हैं। नील वह आईना था और आईने को अनदेखा कर देना चेहरे को नहीं, दृष्टि को धुंधला करता है….पश्चाताप नहीं, उत्तरदायित्व डॉ आरव नें कोई औपचारिक क्षमा नहीं माँगी। न ही कोई भावुक संवाद किया। उन्होंने बस अपने आचरण को पुनः परिभाषित किया…..अब वे किसी का साथ संदर्भ में लेने से पहले संवाद को प्राथमिकता देने लगे…..अब वे समीपता और सम्मोहन के लाभ से अधिक साहित्यिक नैतिकता को महत्व देने लगे और यह परिवर्तन किसी दबाव से नहीं आया बल्कि यह बोध से उपजा संयम था। भविष्य का संकल्प डॉ आरव ने यह भी समझ लिया कि वरिष्ठता विशेषाधिकार नहीं, अधिक उत्तरदायित्व है और यह भी कि, मित्रता सिर्फ भावनाएँ साझा करने से नहीं, साथ मौन समझने से टिकती है। और यह कि कोई भी संबंध तब तक जीवित रहता है जब तक उसमें सम्मान की साँस चलती रहे….और सच्ची मित्रता क्षमायाचना से नहीं, आचरण परिवर्तन से भी पुनर्स्थापित होती है।
डॉ. आरव नें गलती मानी नहीं बल्कि उन्होंने उसे दोहरये जाने से रोक लिया, और यही दार्शनिक नैतिकता का सबसे परिपक्व रूप है……क्योंकि साहित्यिक और बौद्धिक समुदायों में मित्रता का स्वरूप सामान्य सामाजिक मित्रता से भिन्न होता है। यहाँ संबंध भावनात्मक अपेक्षाओं से कम और नैतिक संतुलन से अधिक संचालित होते हैं। साहित्यकारों के मध्य स्थापित मित्रता में संवाद, सम्मान और पारदर्शिता का महत्व विशेष रूप से बढ़ जाता है, क्योंकि यहाँ प्रत्येक व्यक्ति न केवल निजी व्यक्तित्व है, बल्कि एक सार्वजनिक बौद्धिक इकाई भी है। डॉ. आरव और नील का संबंध इसी प्रकार की बौद्धिक मित्रता का प्रतिनिधि उदाहरण है, जहाँ संघर्ष प्रेम या अधिकार का नहीं, बल्कि नैतिक उपेक्षा और संवादहीनता का है।
बौद्धिक मित्रता भावनात्मक नहीं, नैतिक अनुशासन पर आधारित होती है। संवाद का अभाव, चाहे अनजाने में हो, संबंधों को आहत करता है। मौन भी एक वैध नैतिक प्रतिक्रिया हो सकता है….. सच्चा सुधार आत्मग्लानि से नहीं, आचरण-संशोधन से आता है। नैतिक बोध किसी भी अवस्था में संभव है, बशर्ते व्यक्ति अपने विवेक से संवाद करने को तैयार हो। अतः यह कहा जा सकता है कि मित्रता का संरक्षण, भावनाओं से नहीं, नैतिक सजगता से होता है। दोस्ती में आज़ादी ज़रूरी है, पर पारदर्शिता उससे भी ज़्यादा। किसी से मिलना, बात करना गलत नहीं है बल्कि गलत है उस रिश्ते को नज़रअंदाज़ करना, जिसने हमें बिना शर्त अपनाया। और सबसे बड़ी भूल यह मान लेना कि अपमान सह लेना, समझदारी है। कभी-कभी सच्ची दोस्ती वही होती है, जो हमें हमारी कीमत याद दिलाए….चाहे वह असहज ही क्यों न हो ?







