माँ, थोड़े पैसे और चाहिए…

  डॉ. सत्या सिंह पूर्व पुलिस अधिकारी, अधिवक्ता, काउंसलर। 2011 में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति माननीया प्रतिभा पाटिल जी के […]

 

डॉ. सत्या सिंह

डॉ. सत्या सिंह
पूर्व पुलिस अधिकारी, अधिवक्ता, काउंसलर।

2011 में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति माननीया प्रतिभा पाटिल जी के हाथों सम्मानित हो चुकी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की तरफ से 2017 में उन्हें ‘देवी अवार्ड’ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने सम्मानित किया।

आपको सम्मान स्वरूप मिले मेडल, प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कारों से एक कमरा भरा हुआ है।

आप ताइक्वांडो चैंपियन भी हैं।

शाम का समय था। रसोई में दाल उबल रही थी, और खिड़की के बाहर धूप आख़िरी साँसें ले रही थी। शांति थी…..पर वह शांति नहीं, जो सुकून दे….बल्कि वह शांति थी, जो किसी तूफ़ान के आने से ठीक पहले होती है। तभी दरवाज़ा खुला……माँ ने बिना पलटे कहा – “आ गया बेटा?” कोई जवाब नहीं आया। कुछ सेकंड बाद धीमी, थकी हुई आवाज़ गूँजी – “माँ… थोड़े पैसे चाहिए थे।” माँ का हाथ दाल के कलछुल से फिसल गया।
वह कभी ऐसा नहीं था। कभी यह वही बेटा था, जो स्कूल से आकर माँ के आँचल में मुँह छुपाकर रो देता था, जो रात में डर लगने पर माँ का हाथ पकड़े बिना नहीं सोता था। माँ ने उसके लिए क्या नहीं किया था? अपने गहने गिरवी रखे, अपनी इच्छाएँ मार दीं, हर त्यौहार, हर खुशी उसी के नाम कर दी।

पहली बार जब उसने पैसे माँगे थे, तो वजह बहुत साधारण थी – “दोस्त की मदद करनी है। कोर्स के लिए चाहिए, इंटरव्यू के सिलसिले में…” माँ ने सवाल नहीं किए, माँ ने भरोसा किया। जब पैसे खत्म होने लगे, जब घर का सामान गायब होने लगा, जब बेटे की आँखों में अजीब-सी बेचैनी उतर आई – तब भी माँ ने खुद से कहा – “शायद मैं ही ज़्यादा सोच रही हूँ।” क्योंकि माँ का दिल सबसे पहले सच से इनकार करता है।
वह दिन माँ कभी नहीं भूल पाती……पुलिस स्टेशन, एक काग़ज़, और एक शब्द…… ‘ड्रग्स’। उस दिन माँ की आवाज़ नहीं निकली। आँसू भी नहीं आए। बस हाथ काँपते रहे। उसने बेटे से पूछा – “कब से?” बेटा हँस पड़ा “काफी पहले से, माँ।” उस हँसी में पछतावा नहीं था बस लत थी।
माँ ने उसे रिहैब भेजा……हर हफ्ते मिलने जाती, हर बार यही कहती – “तू ठीक हो जाएगा, बेटा।” बेटा रोता……माफी माँगता….. कसम खाता….. और माँ हर बार मान जाती। छह महीने बाद वह लौटा। कुछ दिन सब ठीक रहा। माँ ने मंदिर में दिया जलाया, ईश्वर को धन्यवाद दिया। लेकिन लत कहाँ धैर्य रखती है। कुछ ही हफ्तों बाद फिर वही सवाल, “माँ, पैसे चाहिए।” माँ ने मना किया। बेटे की आवाज़ बदल गई…..“अगर मैं मर गया तो? आपको कोई और चाहिए क्या? आपने ही तो मुझे पैदा किया था!” हर वाक्य माँ के सीने पर हथौड़े की तरह पड़ता। माँ ने पैसे दे दिए, कई कई बार दिए…..कभी किराया, कभी इलाज, कभी दोस्त, कभी कुछ खाने का, कभी दवा का बहाना….. पर पैसे हमेशा नशे तक पहुँच जाते।
अब माँ बाहर कम निकलती। फोन उठाने से डरती। क्योंकि हर कॉल या तो उधारी मांगने वालों की होती जिनसे बेटे नें उधार लिया होता, पुलिस की होती या बेटे की। पड़ोसी पूछते – “बेटा क्या करता है?”

माँ मुस्कुरा देती….“कुछ काम देख रहा है।” माँ झूठ बोलने लगी। क्योंकि समाज से नहीं, वह खुद से छुपा रही थी। उस रात बेटा बहुत देर से नहीं लौटा……माँ ने फोन किया कोई जवाब नहीं……दरवाज़े पर दस्तक हुई दो पुलिस वाले थे। बेटा पकड़ा गया था। इस बार मामला बड़ा था। माँ थाने में एक कुर्सी पर बैठी रही, और पहली बार उसके मन में एक डरावना ख्याल आया…..“अगर यह सब खत्म हो जाए तो?” वह डर गई।
अगले दिन माँ ने बेटे से कहा – “अब पैसे नहीं मिलेंगे।” बेटा चीखा। रोया। धमकाया, “मैं खुद को खत्म कर लूँगा!” माँ ने पहली बार आँखों में आँसू लिए कहा – “अगर मैं तुझे पैसे देती रही, तो तू सच में खत्म हो जाएगा।” यह माँ का प्रेम नहीं यह माँ का साहस था। यह अंत नहीं बल्कि एक मोड़ था, माँ ने इस बार पैसे नहीं दिए और रिहैब में दोबारा भेजा पर शर्त के साथ। अब वह मिलने कम जाती है। रोती है, पर टूटती नहीं। वह जान चुकी है कि, हर बार बचाना, बचाव नहीं होता।
फिर कुछ दिन बाद रिहैब से लौटकर बेटा कुछ दिनों तक बदला हुआ लगा। सुबह समय पर उठता, दवाइयाँ खाता, और पिता के सामने आँखें झुकाकर बैठता क्योंकि पिता सख़्त थे, उन्होंने साफ़ कह दिया था कि, “एक पैसा नहीं मिलेगा अब या तो ठीक हो, या घर छोड़ो।” घर बड़ा था। पैसे की कमी नहीं थी, लेकिन पिता का नियम साफ़ था नशे को एक रुपये की भी मदद नहीं। माँ चुप थी। पर भीतर से काँप रही थी। कुछ ही दिनों बाद बेटा फिर माँ के पास आकर उन्हें भावनात्मक रूप से याचक बन झूठा विश्वास दिलाने लगा कि, अब वह कभी ड्रग को छुएगा भी नहीं। फिर कुछ दिन बाद पहले धीरे से – “माँ, बस दोस्त से मिलना है, फिर थोड़ा और, “माँ, दवा के पैसे कम पड़ गए।” और फिर वही पुराना खेल – झूठ, बहाने, और आँखों में नकली पश्चाताप। माँ ने पैसे नहीं दिए, उस दिन बेटा ज़मीन पर बैठ गया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। हाथ काँपने लगे। “माँ… साँस नहीं आ रही…” उसने सीने पर हाथ रखा……“बस थोड़े पैसे दे दो… मैं मर जाऊँगा, माँ…” माँ घबरा गई……उसका दिमाग़ जानता था कि, यह लत का नाटक है……लेकिन उसका दिल अब भी माँ था। पिता बाहर खड़े सब देख रहे थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस चेहरा फेर लिया। माँ ने काँपते हाथों से अलमारी खोली, कुछ नोट निकाले…..बेटे ने झपटकर पैसे ले लिए और बिना पीछे देखे…..दरवाज़ा बंद कर चला गया।
माँ फर्श पर बैठ गई…..उसे समझ आ गया था कि, नशा गया नहीं है, बस तरीका बदल गया है। अब बेटा पैसे नहीं माँगता है….साँसें उधार माँगता है, और माँ… हर बार डर के मारे उसे ज़िंदा रखने की कोशिश में धीरे-धीरे खुद मरती जा रही है। पिता जानते हैं…..माँ जानती है…..पर कोई जीत नहीं रहा। यह कोई सुखांत नहीं है। यह वही अंत है जो हज़ारों घरों में हर दिन जिया जा रहा है। जहाँ पैसा समस्या नहीं होता, लेकिन माँ का मोह नशे का सबसे बड़ा सहायक बन जाता है……और इस घर में भी…….न बेटा पूरी तरह बचा है, न माँ पूरी तरह टूट पाई है। बस हर दिन साँसें उधार चल रही हैं।
. नशे की लत केवल पदार्थ की नहीं होती,
वह रिश्तों की सीमाओं को भी तोड़ देती है। ऐसे मामलों में माँ का प्रेम अक्सर अनजाने में सह-आसक्ति (Co-dependency) बन जाता है…..जहाँ डर, अपराधबोध और मातृत्व लत को रोकने के बजाय उसे जीवित रखते हैं। “साँसें उधार” जैसे नाटकीय व्यवहार वास्तविक संकट से अधिक नशे की मनोवैज्ञानिक रणनीति होते हैं, जिनका
उद्देश्य सहानुभूति नहीं, नियंत्रण होता है। पिता की सख़्ती यहाँ निर्दयता नहीं, एक आवश्यक सीमा है…..जबकि माँ की मजबूरी उस आंतरिक संघर्ष को दर्शाती है जहाँ प्रेम और संरक्षण एक-दूसरे से टकरा जाते हैं। उपचार केवल रिहैब से पूरा नहीं होता, परिवार की भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का उपचार भी उतना ही ज़रूरी है। जब तक माता-पिता करुणा और अनुशासन के बीच संतुलन नहीं सीखते, लत अपना रूप बदलती रहेगी……और बेटा हर बार पैसे नहीं, साँसें उधार माँगता रहेगा।
यह कहानी एक माँ की कमजोरी की नहीं, उसके प्रेम की भी नहीं बल्कि यह कहानी उस सीमा की है, जहाँ प्रेम अनुशासन माँगता है। नशे में डूबा बच्चा माँ को नहीं, उसके अपराधबोध को पकड़ता है। और जब माँ अपराधबोध से मुक्त होती है, तभी बच्चे के बचने की संभावना शुरू होती है। माना माँ का प्रेम असीम है,पर लत को पालना प्रेम नहीं विनाश है।

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