न्यू ईयर का जश्न –
शहर की सड़कों पर रंगीन बल्ब झिलमिला रहे थे। मॉल्स में “हैप्पी न्यू ईयर” के पोस्टर लगे थे, टीवी पर काउंटडाउन चल रहा था और लोग नए कपड़ों, नए सपनों और नई योजनाओं की बातें कर रहे थे। लेकिन इसी शहर के एक कोने में, रेलवे लाइन के पास बसी झुग्गी-झोपड़ी में न कोई सजावट थी, न उत्सव का शोर।
नया साल : सिर्फ कैलेंडर का एक पन्ना बदलना –
यहाँ नए साल की रात भी बाकी रातों जैसी ही थी…..ठंडी, अंधेरी और संघर्ष से भरी। झोपड़ी की छत से टपकता पानी, जमीन पर बिछी फटी चादर और कोने में जलती छोटी सी लालटेन… यही इनका संसार था। यहाँ रहने वालों के लिए नया साल कोई त्योहार नहीं, बस कैलेंडर का एक पन्ना बदलने का नाम था।
रामू का दर्द –
रामू रोज़ की तरह नए साल की सुबह भी सूरज से पहले उठ गया। आज भी उसे मज़दूरी की तलाश में निकलना था। उसकी जेब में न तो नए साल का तोहफा था, न उम्मीदों की कोई पर्ची। बस कल की बची हुई सूखी रोटी और आज का डर। शहर में पटाखे फूट रहे थे। हँसी की आवाज़ें गूँज रही थीं। उसी आवाज़ के बीच रामू झुग्गी के बाहर बैठा था। उसने आसमान की तरफ देखा।
उसने सोचा…..
क्या नया साल सिर्फ अमीरों के लिए होता है?
क्या गरीबों के हिस्से सिर्फ इंतज़ार आता है?
उसकी पत्नी सीता ने धीरे से कहा,
“आज नया साल है… शायद काम मिल जाए।”
रामू मुस्कुराया, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।
उसने मन ही मन सोचा – नया साल हमारे लिए क्या बदलेगा? वही बेरोज़गारी, वही भूख, वही चिंता।
छोटे छोटे बच्चों के अपूर्ण सपने –
झुग्गी में छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे। किसी ने स्कूल का बैग नहीं उठाया था, किसी ने नए कपड़े नहीं पहने थे।
झुग्गी में बच्चे खेल रहे थे। उनके पास खिलौने नहीं थे, बस टूटे डिब्बे और सपने थे। छोटी बिटिया ने पूछा –
“माँ, नया साल में क्या मिलता है?”
माँ चुप रही।
फिर धीरे से बोली,
“लोगों को उम्मीद मिलती है।”
बिटिया बोली,
“तो हमें क्यों नहीं मिलती?”
माँ की आँखें भर आईं।
क्योंकि कुछ सवालों के जवाब नहीं होते, और इस सवाल का जवाब माँ के पास नहीं था। क्योंकि खुश होने के लिए सिर्फ तारीख नहीं, सुविधाएँ और सुरक्षा भी चाहिए।
सीता ने आज भी चूल्हा जलाया।
धुएँ में उसकी आँखें भर आईं…….धुएँ से या दर्द से, यह कहना मुश्किल था। वह भगवान से रोज़ की तरह आज भी कुछ नहीं माँग रही थी, बस इतना चाहती थी कि –
आज बच्चों को भूखा न सोना पड़े…..आज रामू को काम मिल जाए और आज की रात शांति से कट जाए, उसके लिए नया साल कोई संकल्प नहीं लाया था, बस वही पुरानी प्रार्थनाएँ दोहरा रहा था।
अमीर और गरीब के जीवन मे असमानता –
शहर में लोग पार्टी से लौट रहे थे…..कारों की खिड़कियों से हँसी की आवाज़ें आ रही थीं। उसी सड़क के किनारे झुग्गी में बैठा रामू यह सब देख रहा था। उसने महसूस किया…….एक ही शहर में दो अलग – अलग दुनिया हैं।
एक दुनिया जहाँ नया साल, खुशियों का वादा है, और दूसरी जहाँ सिर्फ संघर्ष की निरंतरता। सीता चूल्हे पर पानी चढ़ा रही थी। आज सब्ज़ी नहीं थी। धुएँ के साथ उसकी आँखों से आँसू भी निकल आए। वह रो नहीं रही थी, बस थक गई थी। वह भगवान से कुछ बड़ा नहीं माँगती थी। बस इतना चाहती थी कि, आज बच्चों का पेट भर जाए, आज पति खाली हाथ न लौटे।
यही उसका नया साल था।
शाम को रामू को आधे दिन की मज़दूरी मिल गई। वह थोड़ा सा आटा और सब्ज़ी लेकर लौटा। सीता की आँखों में चमक आ गई। बच्चे ख़ुशी से हँस पड़े। उस पल, झुग्गी में कोई पार्टी नहीं थी, लेकिन संतोष था। रामू ने कहा –
“शायद हमारे लिए नया साल ऐसे ही आता है……छोटी-छोटी राहतों के साथ।”
रात को जब सब सो गए,
तो झुग्गी की छत के ऊपर आसमान में तारे चमक रहे थे।
नया साल आ चुका था।
लेकिन झुग्गी में वही पुरानी ज़िंदगी थी।
फिर भी,
उम्मीद की किरण –
हर साँस के साथ एक उम्मीद ज़िंदा थी।
क्योंकि झुग्गी-झोपड़ी वालों के लिए
नया साल तब आएगा –
जब भूख न हो,
जब बच्चों के हाथ में किताब हो,
जब मेहनत की कद्र हो।
तब सिर्फ कैलेंडर नहीं,
ज़िंदगी बदलेगी।
इसलिए……….
नव वर्ष केवल तारीख नहीं,
बल्कि बदलाव का नाम है।
और जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति की ज़िंदगी नहीं बदलती,
तब तक नए साल की खुशियाँ अधूरी हैं।







