युवा शक्ति:देश की प्रगति का आधार

डॉ. सत्या सिंह पूर्व पुलिस अधिकारी, अधिवक्ता, काउंसलर। 2011 में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति माननीया प्रतिभा पाटिल जी के हाथों […]

डॉ. सत्या सिंह

डॉ. सत्या सिंह
पूर्व पुलिस अधिकारी, अधिवक्ता, काउंसलर।

2011 में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति माननीया प्रतिभा पाटिल जी के हाथों सम्मानित हो चुकी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की तरफ से 2017 में उन्हें ‘देवी अवार्ड’ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने सम्मानित किया।

आपको सम्मान स्वरूप मिले मेडल, प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कारों से एक कमरा भरा हुआ है।

आप ताइक्वांडो चैंपियन भी हैं।

देश का भविष्य युवा –

दोस्तों यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि किसी भी देश का भविष्य देश के युवाओं के द्वारा ही सुंदर बनता है । हमारा भारत देश तो युवाओं का ही देश है । हमारे देश की जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा युवा वर्ग का है । युवा उनको कहा जाता है जिनकी उम्र 15 साल से 40 साल के बीच हो।

आज़ादी की लड़ाई में युवाओं का योगदान –

भारत देश को आजादी दिलाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, मंगल पांडे , राजगुरू , खुदीराम बोस थे. इसके अलावा भी बहुत से स्वतंत्रता संग्रामी थे, जिन्होंने देश के नाम अपनी जान दे दी । भारतीय युवाओं ने देश को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है, युवाओं के चलते ही देश ने इतनी तेजी से विकास किया है।

स्वार्थ की पराकाष्ठा –

आज का भारतीय युवा स्वार्थी हो गया है, वो देश की तरक्की के बारे में न सोच कर सिर्फ अपने बारे में सोचने लगा है । स्वामी विवेकानंद एक बहुत बड़ा नाम है। उनके शिकागो में वर्ष 1893 में दिए गए भाषण ने उन्हें भारतीय दर्शन और अध्यात्म का अग्रदूत बना दिया था और तब से लेकर आज तक उनके विचार युवाओं के साथ साथ हर उम्र के लोगों को प्रभावित करते रहे हैं। आज के दौर में जब युवा नई-नई समस्याओं का सामना कर रहे हैं, नए लक्ष्य तय कर रहे हैं और अपने लिए एक बेहतर भविष्य की आकांक्षा रख रहे हैं तो स्वामी विवेकानंद के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं।

स्वामी विवेकानंद जी के विचार –

स्वामी विवेकानंद का मानना था कि एक युवा का जीवन सफल होने के साथ-साथ सार्थक भी होना चाहिए, जिससे उसके मस्तिष्क, हृदय और आत्मा का संपोषण भी होता रहे। सार्थक जीवन के विषय में उन्होंने इन विचारों को चार बिंदुओं में समझाया था । शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक संधान। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं में शारीरिक शक्ति और समाज सेवा का भाव होने के साथ-साथ बौद्धिक संधान पर भी बल दिया ताकि युवा दोनों प्रकार की दुनिया को भलीभांति समझ सके।

विवेकानंद जी के शिक्षा के बारे में विचार –

उन्होंने सभी के लिए शिक्षा की बात करते हुए कहा था कि शिक्षा कोई जानकारियों का बंडल नहीं जो दिमाग में रख दिया जाये और वह हमें जिंदगी भर परेशान करते रहे। हमें तो ऐसे विचारों को संजोना है जो समाज निर्माण, व्यक्ति निर्माण, चरित्र निर्माण करे। उन्होंने एक राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था की भी बात कही जिसमें भौतिक और आध्यात्मिक शिक्षा देश के लोगों के हाथों में हो और राष्ट्रीय चिंतन के आधार पर हो। उन्होंने भारत के पुनर्निर्माण में शिक्षा के महत्व पर बल देते हुए कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो आम जनता की मदद करे और साथ ही जीवन में संकटों से निपटने में मददगार बने, चरित्र निर्माण करे, मन में परोपकार का भाव जगाये और सिंह की भांति साहस प्रदान करे।

उनके अनुसार युवाओं को सामाजिक भी होना चाहिये क्योंकि समाज हमारे लिए बनाया गया है, समाज की गतिविधियों में भाग लेना चाहिए, समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझना चाहिये, लेकिन कभी भी समाज की बातों में आकर गलत निर्णय नहीं लेना चाहिये । लोग क्या कहेंगें, समाज क्या कहेगा, यही सोच सोचकर कई बार इन्सान गलत निर्णय ले लेता है, जिससे नुकसान समाज का नहीं, बल्कि उस इन्सान का भी होता है ।

आज की शिक्षा –

आज कल ज्यादातर परिवार के लोग चाहते है कि उनका बच्चा पढ़े। वैसे भी आज के भारत को युवा भारत कहा जाता है क्योंकि हमारे देश में असम्भव को संभव में बदलने वाले युवाओं की संख्या सर्वाधिक है ।

परन्तु आज की एक विडम्बना और आज का एक सत्य यह भी है कि आज के युवा बहुत मनमानी भी करते हैं , किसी की सुनते ही नहीं। दिशाहीनता की इस स्थिति में युवाओं की ऊर्जा का नकारात्मक दिशाओं की ओर मार्गान्तरण व भटकाव होता जा रहा है। लक्ष्यहीनता के माहौल ने युवाओं को इतना दिग्भ्रमित करके रख दिया है कि उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा कि उन्हें करना क्या है, हो क्या रहा है, और आखिर उनका होगा क्या ? साथ ही आज के युवाओ मे धैर्य की कमी, आत्मकेन्द्रिता, नशा, लालच, हिंसा, कामुकता उनके स्वभाव का अंग बनती जा रही है जो कि एक चिंतनीय विषय है !

अभिभावकों की जिम्मेदारी –

मगर यदि हम इस समस्या की तह तक जाए तो पहला अपराध माता पिता व अभिभावक का ही होता है ! क्योंकि उनकी व्यावसायिक व्यस्तता, अधिक धन कमाने की लालसा में व्यस्त रहना , माता पिता का उलझे रहना युवाओ की तरफ ध्यान केन्द्रित नही कर पाने की एक बहुत ही गम्भीर समस्या है। आज की युवा पीढ़ी कर्तव्य-पालन के समय देशों के उदाहरण दिया करती है। वहाँ युवक-युवती प्रारंभ से ही अपनी अलग गृहस्थी बसा लेते हैं। परंतु ये लोग इस तथ्य को नकार देते हैं कि वहाँ बहुत छोटी अवस्था से ही किशोर-किशोरी स्वावलंबी हो जाते हैं। वे अपने पोषण के लिए माता-पिता पर निर्भर नहीं करते। अगर सब कुछ सही होता है तो उसका क्रेडिट ख़ुद लेते हैं । पर कुछ गलत हुआ, वे असफ़ल हुए तो माता पिता को जिम्मेदार मानते हैं ।

आज की अधिकांश युवा पीढ़ी खुद को इतना समझदार मानती है कि वह अपने बुजुर्गों को अपने आगे बोलने तक नहीं देती साथ ही उनके साथ जबान लड़ाना तो आजकल फैशन हो गया है । कोई बड़ा जरा कुछ समझाए तो पढ़े लिखे कहते हैं कि ऊँची आवाज नहीं ढंग से बात करो। यह तो कुछ नहीं आजकल तो बच्चे माँ बाप को गालियां तक देने से भी परहेज़ नहीं करते। सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल नौजवानो के लिए लाभप्रद साबित हो सकता है, जिसका इस्तेमाल वह बखूबी करते हैं । अपने विचारों का सही रूप से आदान -प्रदान करना यह उनकी पीढ़ी की जिम्मेदारी है, साथ ही अपने नए सुविचारों का समाज में प्रयोग करके समाज को एक नयी दिशा भी दे सकते हैं । अगर जज़्बा सही हो तो आज का युवा वर्ग समाज की नकारात्मक सोच को बदलने की ताकत रखता है ।

सोशल मीडिया का प्रभाव –

वैसे आज की युवा पीढ़ी मोबाइल और कंप्यूटर पर ज़्यादा व्यस्त रहती है जिसकी वजह से वह अपने परिवारों को ज़्यादा वक़्त नहीं देते है, जबकि युवा वर्ग को अपने परिवार की उतनी कदर करनी चाहिए जितना वह अपने दोस्तों की करते है। हर क्षेत्र का सही उपयोग सही समय पर करना एक जिम्मेदार नौजवान का कर्त्तव्य है। कुछ नौजवान अपने मनोरंजन और ग़मों को भुलाने के लिए नशे के पदार्थों का सहारा लेते है जो कि गलत कदम है। अपने परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व प्रत्येक युवा वर्ग को होना चाहिए। नशे की दुनिया एक नकारात्मक कदम है जिसपर अंकुश लगाना भी युवा वर्ग का काफ़ी हद तक दायित्व है।

विश्व में कई जगहों पर हिंसा का कारण युवा वर्ग ही है, जिसके कारण कभी-कभी वे ज़िन्दगी में कुछ गलत फैसला भी ले लेते हैं और किसी की भी बातों में आ जाते हैं । ऐसी स्थिति में हर सही फैसले और कार्य का चुनाव करना भी उनका ही कर्तव्य है। उन्हें किसी भी हाल में अपने संयम को नहीं खोना है।

आधुनिक युवक अपने बुजुर्गों द्वारा निर्धारित नियमों के अनुरूप चलने में अपनी तौहीन समझते हैं। वे अपने माता-पिता और अभिभावकों का साथ तो चाहते हैं लेकिन हर कदम पर उनका मार्गदर्शन नहीं चाहते। आज की युवा पीढ़ी नई चीजें सीखना चाहती है और दुनिया में खुद को तलाश करना चाहती है मगर साथ ही आज के युवा काफी बेसब्र और उतावले भी हैं। ये लोग तुरन्त सब कुछ करना चाहते हैं और अगर चीजें उनके हिसाब से नहीं चलती हैं तो वे जल्द ही निराश और नाराज हो जाते हैं।

आधुनिक युवा वर्ग की खूबियां –

हालांकि आधुनिक युवाओं के बारे में सब कुछ नकारात्मक नहीं है। आज के युवक उत्सुक और प्रेरित भी हैं। आज के युवाओं का समूह काफ़ी होशियार है और अपने लक्ष्य को हासिल करना अच्छी तरह से जानता है।

माता पिता का सम्मान –

युवाओं को यह समझना चाहिए और उनका कर्तव्य है कि वह अपने माता-पिता का सम्मान करें, उनकी आज्ञा का पालन करें, अपने बड़े बुजुर्गों, गुरु आदि का भी सम्मान करें. बड़े बुजुर्गों, गुरु की आज्ञा का पालन करें, और अपने गुरुजनों के बताए हुए मार्ग पर चल कर अपने भविष्य को उज्जवल बनाएं ।

एक अच्छे भविष्य के लिए युवाओं को इन बातों पर ध्यान देना चाहिए कि वे अहंकार व अहं का त्याग कर जीवन में कड़ा परिश्रम करें । उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक कठोर पत्थर हथौड़े की अंतिम चोट से ही टूटता है तथा उन्हें निरंतर परिश्रम करते रहना चाहिए।

लक्ष्य निर्धारण –

बुरी संगत को त्याग कर अच्छी संगत का साथ देना चाहिए। याद रखें कि यदि लोहे को खुली हवा में बाहर रख दिया जाए तो उसे जंग लग जाता है मगर उसी लोहे को यदि आग से गुजारा जाए तो वह एक बहुमूल्य स्टील का रूप धारण कर लेता है। उन्हें अपना एक लक्ष्य बनाना चाहिए तथा बिना लक्ष्य के उनकी मेहनत बेकार जाएगी ।

उन्हें चाहिए कि वे अपनी आत्मा का विशलेषण व आत्मबोध करें तथा अपने अस्तित्व व क्षमता की पहचान करें। साथ ही अपने समय को व्यर्थ न गंवाएं तथा समय प्रबंधन की कला को सीखें। समय किसी का इंतजार नहीं करता तथा आगे निकलता ही चला जाता है। अपने आत्मविश्वास को बनाए रखें क्योंकि जिंदगी में बहुत-सी असफलताओं का उनको सामना करना पड़ेगा।

सेहत का महत्व –

दोस्तों जीवन में अच्छी सेहत का होना सबसे बड़ा सुख माना गया है इसलिए वे अपने आप को मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रखें क्योंकि यदि सेहत नहीं है तो बाकी सुखों का भोग आप नहीं कर पाओगे। सादगी और विन्रमता बनाए रखें तथा जमीन से नाता न तोड़ें नहीं तो उड़ती पतंग की तरह आपकी डोर कभी भी कट सकती है। केवल वे ही अपनी मंजिल को पार कर पाते हैं जो लोग सफर की शुरूआत करते हैं । हार के बाद जीत उसी तरह होती है जैसा कि अंधेरे के बाद उजाला होता है।

माता पिता का कर्तव्य –

माँ-बाप का भी यह नैतिक कर्तव्य है कि जब बच्चे इस उम्र में आयें, उससे पहले ही वे उन्हें गलत और सही के बीच की रेखा को समझा दे, जिससे वह सही फैसला ले सकें। इस उम्र में युवा वर्ग बहुत अधिक उत्सुक रहते है और जिन्दगी के हर पहलु को जानने के लिए हर प्रकार का प्रयोग करते है।

इसमें नियंत्रण लाना यह युवा वर्ग के साथ साथ माता पिता की भी जिम्मेदारी है। नौजवानो के अंदर कई प्रतिभाएं होती है जिसे उन्हें पहचान कर सही मार्ग पर जाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। उन्हें समझाना चाहिए कि असफलताओं से घबराकर, निराश और बेसब्र नहीं होना चाहिए। आज की युवा पीढ़ी कल देश का सुनहरा भविष्य बनेगी। उन्हें सही प्रोत्साहन के साथ उन्हें अपनी ज़िन्दगी और देश की उन्नति को ऊचाँइओ पर ले जाना है इसके लिए अपने बच्चे को नैतिक मूल्यों को सिखाने के लिए उनकी 10 या 10 साल से अधिक की उम्र के लिए इंतजार न करें। इसकी शुरुआत तब करें जब वे बच्चे हो।

उन्हें सिखाएं कि कैसे सार्वजनिक रूप से व्यवहार करें, अलग-अलग कार्य और अन्य चीजों को एक शुरुआती उम्र से कैसे संभाले। बेशक उन्हें कुछ भी पढ़ाते वक्त या उनके द्वारा किए किसी कार्य को जांचने के दौरान उनकी आयु को ध्यान में रखें। माता पिता के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वे अपने बच्चों को क्या सही है और क्या गलत है इसके बारे में भी जानकारी दें ।

उनकी उम्र के आधार पर उन्हें समय-समय पर नैतिक शिक्षा दें। इसके साथ ही उन्हें बुरे व्यवहार या कार्यों के परिणाम के बारे में बता कर उनका मार्गदर्शन करें।

बच्चों को स्वावलंबी बनाना –

हमें चाहिये कि हम अपने बच्चों को हर समय लाड़-प्यार करने की बजाए उन्हें स्वावलंबन के बारे में भी बतायें और इसका बोध करायें । छोटे छोटे कार्यों को उन्हें करने दें जैसे कि खाने की मेज को व्यवस्थित करने, या फलों और सब्जियों को अलग करने या, खिलौने को सही जगह पर रखने में उनसे मदद ले सकते हैं।

यह उनमें ज़िम्मेदारी की भावना को जन्म देता है और उन्हें जीवन में बड़ी जिम्मेदारियों को लेने के लिए तैयार करता है। माता पिता को अपने बच्चों के अच्छे कामों की सराहना भी करनी चाहिए ताकि उनका आत्मविश्वास बढ़े और यह उन्हें बार-बार अच्छे व्यवहार को करने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद भी करेगा, और यही अंततः उनके व्यवहार में शामिल हो जाएगा । जैसे-जैसे माता पिता उन्हें बताएंगे कि क्या सही और क्या गलत है तथा उन्हें नैतिक शिक्षा देंगे साथ ही और कार्य सौंपगें यह सही है पर उनके प्रति बहुत कठोर ना बनें। उन्हें यह भी समझने की ज़रूरत है कि कभी कभी ऐसा वक़्त भी हो सकता है जब वे उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरेंगे और अगर ऐसा होता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

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